अल्मोड़ा संग्रहालय की शान हैं- कुणिंदों के अल्मोड़ा सिक्के

kuninda coins

Kuninda Silver Coins (Source: Wikipedia)

अल्मोड़ा का राजकीय संग्रहालय अपनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों के कारण इतिहासविदों, मुद्रा शास्त्रियों एवं पर्यटकों का आकर्षण बना हुआ है। यहां प्रदर्शित दुर्लभ कुणिन्द मुद्रायें केवल अल्मोड़ा, शिमला (हिंमाचल प्रदेश) तथा ब्रिटिश म्यूजियम में ही हैं। प्रारम्भ में कुणिन्दों की मुद्रायें केवल अल्मोड़ा जनपद से प्राप्त हुई थीं इस कारण इन मुद्राओं को अल्मोड़ा सिक्कों का नाम दिया गया है। इन पर शोध करने के लिए भारी संख्या में शोधार्थी अल्मोड़ा संग्र्रहालय आते है।

कुणिंद उत्तर भारत का एक प्रख्यात एवं शक्तिशाली प्राचीन जनजातीय समूह था जिसने दूसरी शती ई.पूर्व से तीसरी शती ई0 के बीच मध्य हिमालय में वर्तमान के उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश में कुलु कांगड़ा तक अपना सशक्त गण शासन स्थापित किया था। कुछ विद्वान इन्हें शुंग शासकों की ही एक शाखा मानते है। हिमांचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में आज भी इनके शासन के अनेक साक्ष्य मिलते हैं। कुणिन्दों का शासन काफी विस्तृत था और उनके कई सौ कुल थे। महाभारत में उल्लेख है कि उन्होंने युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ के समय पिप्पीलिका सुवर्ण भेंट किया था। कुणिदों का उल्लेख रामायण और पुराणों में भी हुआ है। वराहमिहिर के कथनानुसार के उत्तरपूर्व के निवासी थे। प्राचीन साहित्यिक सूत्रों के अनुसार ये लोग हिमालय के पंजाब और उत्तर प्रदेश से सटे हिस्से में रहते थे। कुमायूँ और गढ़वाल का क्षेत्र इनके अधिकार में था। कहा तो यह भी जाता है कि कुलिन्द जनपद का ही नाम स्त्रुध्न भी था।

अनेक विद्वान मानते है कि शक्तिशाली कुषाणों को पराजित करने में भी कुणिन्द शासकों का भारी योगदान था। £ेनसांग का स्त्रुध्न कुणिन्दों के राज्य का केन्द्र था तथा पूर्व मे गौतम बुद्ध ने यहां आकर उपदेश भी दिया था यह स्थान देहरादून के पास कालसी नामक स्थान पर था। टिहरी जनपद के रानीहाट से प्रमाण मिले हैं कि कुणिन्दों के शासन में वर्तमान उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश र्में इंटो से भवन निर्माण के विधिवत परम्परा की स्थापना हो चुकी थी तथा वे कुम्हारों के चाक पर बर्तन बनाना जानते थे। उन्होनंे अश्वमेध यज्ञ को भी सम्पन्न कराया था।

अल्मोड़ा संग्रहालय में कुणिन्दों के 15 सिक्के है। ये सिक्के तत्कालीन अल्मोड़ा जिले की कत्यूर घाटी से 1979 में प्राप्त हुए । राजकीय संग्रहालय की प्रभारी श्रीमती मंजू तिवारी कहती हैं कि कत्यूर घाटी से प्राप्त इन सिक्कों को संग्रहालय के लिए मोहन सिंह गड़िया ने दिया था। जिन्हें सरकारी औपचारिकतायें पूरी कर 1981 में संग्रहालय में लाया गया। ये सभी सिक्के सीसा मिश्रित तांबे के बने हुए हैं। राजकीय संग्रहालय के पास अन्य मुद्राओं का भी बेशकीमती भंडार है। कुणिन्द सिक्कों को फिलहाल यौधेय, पांचाल गुप्त तथा कुषाण सिक्कों के साथ प्रदर्शित किया गया है। अल्मोड़ा सिक्कों पर ब्राकृी लिपि का प्रयोग हुआ है। इन सिक्कों का आकार और रूप कुषाण और इंडो ग्रीक सिक्कों जैसा ही है। कुणिन्द गणराज्य के जो सिक्के मिले हैं उनसे ज्ञात होता है कि वे लोग अपना शासन भगवान् चित्रेश्वर (शिव) के नाम पर करते थे। रानीबाग काठगोदाम में चित्रेश्वर कुमाऊँ में चित्रशिला नामक स्थान में आज भी विद्यमान हैं। जहां जिया रानी के सम्मान मे प्रतिवर्ष मेला लगता है। ऐसा भी जान पड़ता है कि इस गणतंत्रीय राज्य ने बाद में राजतंत्र का रूप धारण कर लिया था। कुणिदों के अधिकतर सिक्के प्रथम शासक अमोघभूती के नाम पर हैं जिनपर उसके लिए शीर्षक महाराज उत्कीर्ण किया गया है। साक्ष्य बताते हैं कि इस तरह के सिक्के उनके मरणोपरान्त भी उपयोग में लाए जाते रहे। कुछ सिक्कों  में शिव प्रतीकों को भी प्रदर्शित किया गया है। सिक्कों पर खरोष्टी लिपि का भी प्रयोग हुआ है। ब्रिटिश म्यूजियम में रखे अल्मोड़ा सिक्कों में धातु के रूप में चांदी,तांबा तथा मिश्र धातु के रूप में सीसा भी प्रयोग हुआ है।

कुणिन्दों के सिक्कों के बारे में कहा जाता है कि यह किसी भी शासन तंत्र द्वारा हिमालय में प्रसारित की गई प्रथम मुद्रायें हैं। कुणिन्दों के तीन तरह के सिक्के हिमालय में पाए गये हैं । मुद्राशास्त्रियों ने इन्हें अमोघभूति प्रकार, अल्मोड़ा सिक्के तथा छत्रेश्वर प्रकार में विभाजित किया है। इतिहासकारों के अनुसार यह सिक्के  ग्रीक साम्राज्य से प्रभावित होकर बनाए गए हैं। अल्मोड़ा सिक्के मुख्यतः चांदी तथा तांबे अथवा मिश्र धातु के बने हैं जिन पर अमोघभूति, विजयभूति, गोमित्र, हरदत्त, शिवदत्त तथा शिवपालित आदि शासकों के नाम अंकित हैं। ये सिक्के प्रथम शती ईपू से दूसरी शती ई में जारी किये गये थे। कत्यूर घाटी से प्राप्त तांबा तथा मिश्रित धातु के सिक्कों के कारण कुछ विद्वानों का  मत है कि ये सिक्के स्थानीय खानों से प्राप्त तांबे से ही बनाये जाते थे। तांबे की खाने बागेश्वर जनपद खरही पट्टी तथा बिलौनासेरा में प्राचीन समय से ही मौजूद रही है।

    Kaushal Kishore Saxena Apr 17th 2011 02:46 pm Articles No Comments yet Trackback URI Comments RSS

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