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देश स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयन्ती मना रहा है लेकिन अल्मोड़ा में स्वामी जी से संबंधित स्थल उपेक्षित है

 

 

 


कौशल किशोर सक्सेना

अल्मोड़ा। भारत को आध्यात्मिक विश्व गुरू के रूप में प्रतिष्ठित करने व युवा भारत  को जाग्रति का सन्देश देने वाले स्वामी विवेकानंद से सम्बन्धित अल्मोड़ा नगर के महत्वपूर्ण स्थल उपेक्षा का शिकार हैं। इन स्थानों के सम्बन्ध में अधिकांष लोगों को न तो कोई जानकारी है न ही शासन-प्रशासन ने इनकी कोई सुध लेने की कोशिश की है।  पर्यटक अल्मोड़ा आकर इन स्थानों को देखना-समझना चाहते हैं लेकिन मानवीय उपेक्षा से बेहाल इन स्थानों को देख कर केवल अफसोस ही करते रह जाते हैं।
स्वामी विवेकानंद का अल्मोड़ा नगर से सम्बन्ध तब का है जब वे केवल नरंन्द्र थे, उनकी विश्वख्याति नहीं हुई थी। स्वामी जी अल्मोडा़ तीन बार आये । पहली बार वर्ष 1890 में हिमालय यात्रा के समय जब वे एक आम संन्यासी की तरह अपने गुरू भाई अखंडानंद के साथ यहाँ आये तब हल्द्वानी-अल्मोड़ा मार्ग पर काकड़ीघाट के पास पीपल के एक वृक्ष के नीचे उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। यहीं समाधि अवस्था में उन्हें नन्हें से अणु में समूचा ब्रहमांड केसे समाया है, इस सत्य का भी ज्ञान हुआ ।
इसी यात्रा के समय अल्मोड़ा के निकट करबला में कब्रिस्तान के पास स्वामी विवेकानन्द भूख, प्यास से निढ़ाल होकर अचेत हो गए थे। कब्रिस्तान के रखवाले एक मुस्लिम फकीर ने खीरा खिलाकर यहाँ उनकी प्राणरक्षा की थी। स्वामी जी शिकागो यात्रा के बाद जब पुनः अल्मोड़ा आये तब तक वे विश्व प्रसिद्ध हो चुके थे। उन्होंने अपने स्वागत के लिए आई भीड़ में भी उस मुस्लिम फकीर को पहचान लिया और कहा कि इस व्यक्ति ने ही उनकी प्राण रक्षा की थी। उस अविस्मरणीय घटना को चिरस्थायी बनाने के लिए इसी स्थान पर स्वामी जी के अनन्य भक्त तथा विवेकानंद कृषि संस्थान के संस्थापक वैज्ञानिक बोसी सेन की पत्नी गर्ट्रूड इमरसन सेन की प्रेरणा से वर्ष 1971 को स्वामी विवेकानन्द मेमोरियल विश्राम कक्ष की स्थापना की गई। इस दर्शनीय स्मारक में अद्भभत शांति का अनुभव हो इसलिए स्मारक को यात्रियों के विश्राम स्थल का रूप दिया गया। इसके निर्माण में ध्यान रखा गया था कि यहाँ बैठकर पर्यटक प्राकृतिक सुन्दरता का आनंद ले सकें । इसे फूलों से आच्छादित करने के लिए स्मारक से सटी भूमि पर छायादार वृ़क्ष लगाये गये । स्मारक में प्रसि़द्ध अमेरिकी चित्रकार अर्ल ब्रूस्टर द्वारा निर्मित चित्र की प्रतिकृति लगायी गयी जिसमें घ्यानावस्था में स्वामी जी के चित्र के पीछे कैलाश पर्वत तथा मानसरोवर झील का अंकन था । स्वामी जी के विचारों को हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी में अंकित किया गया। ये विचार सेवा, कार्य, धर्म, आदर्श, एकता, आस्था, स्वतंत्रता, चरित्र तथा सत्य के विषय में स्वामी जी के चिंतन को दर्शाते थे।
लेकिन अब यह स्मारक वीरान है। न यहाँ पुष्प हैं न ही स्वामी जी से सम्बन्धित कोई सामग्री। स्मारक का नैसर्गिक सौन्दर्य नष्ट हो गया है।
स्वामी जी के अल्मोड़ा प्रवास का गवाह थाम्पसन हाउस अब मात्र सरकारी कार्यालय है। टूटफूट का शिकार यह भवन सरकारी उपेक्षा की कहानी स्वंय कह रहा है। इसकी दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है। स्वामी जी ने इस भवन में 1898 में निवास किया था। अपने अल्मोड़ा प्रवास के दौराना स्वामी जी कसारदेवी की जिस गुफा में ध्यान करते थे तथा उनके प्रिय स्थल देवलधार और स्याहीदेवी का उल्लेख करने वाला कोई सूचनापट तक उपलब्ध नहीं है। स्वामी जी की शिष्या भगनी निवेदिता का प्रवास स्थल ओकले हाउस का नाम बदल कर निवेदिता काॅटेज भले ही कर दिया गया है लेकिन जब इसके मालिक गिरीश साह ने भवन को विरासत के रूप में संजोने का प्रयास किया तो उन्हें सरकारी उदासीनता से गहरी निराशा हाथ लगी। इस काम में सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की। अल्मोड़ा में जिस स्थान पर स्वामी जी का सार्वजनिक अभिनंन्दन किया गया वहां भी कोई प्रतीक चिन्ह नहीं है। स्वामी जी ने हिन्दी में अपना पहला भाषण राजकीय इण्टर कालेज में दिया था परन्तु नगर में इसकी जानकारी देने वाला कोई पट तक नहीं लगाया गया है। पूरे नगर में ऐसा कोई भी सूचना पट नहीं है जिसमें स्वामी जी से सम्बन्धित कहीं कोई जानकारी उपलब्ध हो या लगता हो कि इस नगर में स्वामी जी ने तीन बार प्रवास किया था।
अल्मोड़ा बाजार में एक निजी भवन में जरूर प्रस्तरपट लगाकर स्वामी जी की स्मृति को कायम रखा गया है जिसमें बताया गया है कि इस भवन में स्वामी जी ने दो बार प्रवास किया था। इस भवन के मालिक स्वामी जी के अभिन्न मित्र श्री बद्रीशाह थे जिनके आतिथ्य में स्वामी जी अल्मोड़ा में रहते थे। स्वामी जी के भाषणों का संग्रह कोलम्बो से अल्मोड़ा तक  नाम से प्रकाशित हुआ है।
आश्चर्य की बात तो ये है कि स्वामी विवेकानंद से सम्बन्धित इन स्थलों की यह उपेक्षा उस अल्मोड़ा नगर में हुई है जहाँ स्वामी जी के स्वागत में लोगों ने पलक पांवड़े बिछा दिए थे। इन उपेक्षित स्थलों को ध्यानकेंद्र के रुप में विकसित कर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनाया जा सकता है परन्तु लगता है यह स्थल भी जल्द ही अपनी पहचान खेा देंगे।
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    Posted by Kaushal Kishore Saxena on Apr 26th 2012 | Filed in Uncategorized | Comments (1)

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    Indigenous art and craft constitute integral part of Kumaon culture. These portray the genius of the people and places. Spanning over centuries an amazing and awe inspiring mosaic of cultural artifacts have evolved presenting a magnificent landscape for cultural tourism. Obviously, the spread effect of Kumaon genius has assumed global proportion and made it a prime destination for the tourist to compulsively spare time to go in search of things of joy and man made beauty. Himvan.com has brought them all here for you.


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    Comments :





    सुशील कुमार जोशी : कैलाश के उज्जवल भविष्य के लिये शुभकामनाएं और हिमवान की टीम को साधुवाद

    Mmjoshi19 : Very good effort for the information of our Cultural heritage.
    Congrats Saxena ji.

    S.K. Joshi : बहुत से अन्छुवे पहलुवों को समेट कर जो इंद्रधनुषी गुलदस्ता आप बना रहे हैं वाकई काबिले तारीफ है।
    साधुवाद!

    S. K. Joshi : माना कि हाशिये बहुत हैं
    प्रतिभा को नकारने के लिये
    फूलों को फेंकते चले जाइये
    खुश्बू को कैसे रोकेंगे फैलने से?


    Aradhana : Beautiful expressions of the magnificent Himalayas… So live and real..


    Rakesh Rayal : जोशी जी की ‘कला’ में साहित्‍य की झलक नजर आती है। साहित्‍य का जुडाव भावनाओं से होता है और भावनाओं का जुडाव दिल से। इनके अन्‍दर वही बात है जिसे जानकार कहते हैं ”जैसी दृष्टि वैसी श्रृष्टि”। किसी भी वस्‍तु या सौन्‍दर्यता को देखने के लिए आंखे और समझने के लिए सोच होनी चाहिए। जोशी जी इन सब बातों के धनी हैं।

    सारदा मठ कसारदेवी-अल्मोड़ा


    हिमालय की भारत के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वामी विवेकानंद तो हिमालय की इस आध्यामिक भूमिका के हमेशा ही प्रशंसक रहे। उन्होने कुमाऊँ हिमालय की चार बार यात्रायें की। अल्मोड़ा पर तो वे इतने रीझे कि उन्होंने तत्कालीन अल्मोड़ा जिले में अद्वैत आश्रम मायावती की स्थापना की तथा अल्मोड़ा में कर्मयोगी सन्यासियों के लिए विवेकानंद कुटीर की स्थापना की प्रेरणा दी। स्वामी जी का अल्मोड़ा के लिए यह मोह एक तो काकड़ीधाट में प्राप्त दिव्यज्ञान के कारण रहा दूसरा कसारदेवी पर्वत माला की गुफा भी उनकी साधना स्थली रही। हिमालय में प्राप्त आध्यात्मिक उर्जा को सतत भाव से ग्रहण किया जाये इसलिए वे महिलाओं के लिए भी हिमालय में एक आश्रम की स्थापना करना चाहते थे। उनका विचार था कि मातृशक्ति ही इसका प्रसार देश एवं समाज के हित और उत्थान के लिए अन्य क्षेत्रों में कर सकती थी। सम्भवतः उतिष्ठितः भारत के मूल विचार की प्ररेणा भी उन्हें अल्मोड़ा से ही प्राप्त हुई। उनके द्वारा दिये गये भाषण की श्रंखला भी कोलम्बो से अल्मोड़ा के नाम से प्रकाशित की गयी।
    शिकागो में 1893 में दिये गये ऐतिहासिक भाषण के बाद ही स्वामी जी का स्वप्न बन गया था कि भारत वर्ष को आध्यात्मिक रूप से उपर उठाया जाये। उनका विचार था कि इस कार्य के लिए जब तक भारत की महिलाओं को आगे नहीं लाया जाता तब तक सार्थक परिणाम निकलने कठिन हैं। नारी शक्ति के माध्यम से ही भारत को शिक्षित और ज्ञानवान बनाया जा सकता है। हिमालय में प्राप्त आध्यात्मिक उर्जा को सतत भाव से ग्रहण किया जाये इसलिए वे महिलाओं के लिए भी हिमालय में एक आश्रम की स्थापना करना चाहते थे। मातृशक्ति ही इसका प्रसार देश एवं समाज के हित और उत्थान के लिए अन्य क्षेत्रों में कर सकती थी। स्वामी जी के गुरू स्वामी रामकृण का यह भी सपना था कि महिलाओं की आध्यात्मिक शक्ति को जाग्रत करने के लिए हिमालय में एक केन्द्र की स्थापना की जाये। स्वामी विवेकालंद के इस स्वप्न को साकार होने में उनकी पहली अल्मोड़ा यात्रा के बाद 106 वर्ष लगे। शारदामठ दक्षिणेश्वर कलकत्ता ने इसके लिए 1996 में अल्मोड़ा में स्वामी जी के तपस्या स्थल कसारदेवी पर्वत श्रंखला में शारदामठ की स्थापना के लिए 40 नाली भूमि क्र्रय की गयी। शारदामठ की हिमालय क्षेत्र में स्थापित यह प्रथम इकाई है। आश्रम का उद्देश्य है कि कि इस क्षेत्र में महिलाओं तथा बच्चों की स्थितियों में सुधार किया जाये तथा उन्हें निशुल्क शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधा दी जायंे तथा आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनाया जाये।
    वर्ष 1998 से इस आश्रम के निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। वर्तमान में कसारदेवी की पवित्र पर्वत भूमि पर यह आश्रम स्थापित है। ऊपरी क़क्ष में मंदिर एवं ध्यान केन्द्र है जबकि नीचे कक्ष में आश्रम की संवासिनियां निवास करती हंै। पिछले वर्षो में आश्रम ने निशुल्क स्वास्थ शिविर चलाये है। महिलाओं को आघ्यात्मिक रूप से सशक्त करने के लिए भी आश्रम सक्रिय है।
    पिछले कई वर्षासे श्री सारदा मां कीं पुण्यतिथी पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। आध्यात्मिक कार्यकलापों के अतिरिक्त इनमें ंविभिन्न विद्यालयों के बच्चों भी भाग लेते हैं। आश्रम की ओर से सामूहिक भंडारे का भी आयोजन होता है।
    आगामी 28 अप्रेल 2012 को स्वामी जी की 150वी जयन्ती अल्मोड़ा में धूमधाम से मनाई जायेगी । नगर में इसके लिए शारदा मठ के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे है।

      Posted by Kaushal Kishore Saxena on Apr 15th 2012 | Filed in Articles | Comments (0)

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